अमेरिका ने 200 वेनेजुएला नागरिकों को केवल टैटू के आधार पर डिपोर्ट किया, ट्रंप के आदेश पर हुआ कदम
अमेरिका में वेनेजुएला के करीब 200 नागरिकों को सिर्फ उनके टैटू के आधार पर खतरनाक गैंग ‘ट्रेन डे अरागुआ’ का सदस्य मानते हुए डिपोर्ट कर दिया गया. यह डिपोर्टेशन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश से हुआ, जिन्होंने 18वीं सदी के युद्धकालीन कानून का हवाला देते हुए इन लोगों को बिना कानूनी प्रक्रिया के ही अल सल्वाडोर की एक कुख्यात जेल में भेज दिया.
न्यूयॉर्क स्थित कानूनी समूह द ब्रोंक्स डिफेंडर्स और अन्य वकीलों ने इस डिपोर्टेशन की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार के पास यह साबित करने का कोई ठोस सबूत नहीं है कि डिपोर्ट किए गए लोग किसी गैंग का हिस्सा थे. उनके मुताबिक, सिर्फ जेनरल टैटू होने के कारण उन्हें खतरनाक गैंग का सदस्य मान लिया गया.
जबरन किया गिरफ्तार
इनमें से एक व्यक्ति जे.जी.जी. को अधिकारियों ने इसलिए पकड़ा क्योंकि उसके पास आंख का टैटू था. जब उसने अधिकारियों से कहा कि यह उसे गूगल पर पसंद आया था, तो उसकी बात को अनसुना कर दिया गया. इसी तरह, जेर्स रेयेस बारियोस नाम के एक व्यक्ति को इसलिए डिपोर्ट किया गया क्योंकि उसके टैटू में एक ताज, एक फुटबॉल और ‘Dios’ लिखा था.
टैटू और गैंग की पहचान
कुछ मामलों में, टैटू को अपराधियों की पहचान का संकेत माना जाता है. MS-13 जैसे कुख्यात गिरोह के सदस्यों के चेहरे पर टैटू होते हैं, जो उनकी गैंग से कनेक्शन को बताते हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रेन डे अरागुआ गिरोह के लिए टैटू उतने जरूरी नहीं होते.
इसके अलावा, ताज, सितारे, घड़ियां आदि डिज़ाइन पूरी दुनिया में आम हैं और इनका कोई निश्चित अपराध से संबंध नहीं होता. उदाहरण के लिए, रेयेस बारियोस का टैटू स्पेनिश फुटबॉल क्लब रियल मैड्रिड से प्रेरित था, लेकिन अधिकारियों ने इसे अपराधी होने का प्रमाण मान लिया.
अमेरिका अधिकारियों का दावा
अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि केवल टैटू के आधार पर ही गिरफ्तारियां नहीं हुईं, लेकिन वकीलों और परिवारों का कहना है कि टैटू को बार-बार गैंग सदस्यता का प्रमाण बताया गया. इस डिपोर्टेशन से पहले, पीड़ितों को अपने वकीलों से मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई. जब वे अपने वकीलों तक पहुंचे, तब तक वे अमेरिका से बाहर भेजे जा चुके थे. इससे सवाल उठता है कि क्या यह डिपोर्टेशन कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करता है या नहीं.
इस मुद्दे को लेकर न्यायिक समीक्षा की मांग उठ रही है. अमेरिकी मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बिना किसी उचित जांच के इस तरह का डिपोर्टेशन गैरकानूनी है. वेनेजुएला सरकार ने भी इस पर नाराजगी जताई है और अमेरिका से स्पष्टीकरण की मांग की है.
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