इच्छामृत्यु की प्रक्रिया तेज, जीवनरक्षक सुविधाओं के बाद पानी भी बंद
नई दिल्ली। लंबे समय से जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे गाजियाबाद निवासी हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया अगले चरण में पहुंच गई है। मंगलवार को पानी की आपूर्ति पूरी तरह बंद कर दी गई और फीडिंग ट्यूब पर कैप लगा दी गई है। हालांकि इसे अभी शरीर से हटाया नहीं गया है। इसका फैसला सोमवार को चिकित्सकीय बोर्ड की बैठक में लिया गया था। सूत्रों की मानें तो पूरी प्रक्रिया उचित दिशा-निर्देशों के तहत की जा रही है। इससे पहले हरीश के जीवनरक्षक उपचार और फीडिंग सपोर्ट को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा चुका है। सूत्र बताते हैं कि मानवीय पहल के तहत एम्स प्रशासन ने उनके माता-पिता निर्मला देवी और अशोक राणा को पैलिएटिव केयर सेंटर में रहने का इंतजाम किया है। उन्हें हरीश राणा के बगल वाले कमरे में रहने की अनुमति दी है। इससे वह मुश्किल समय में बेटे के साथ रह सकते हैं। यह निर्णय मानवीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एम्स चिकित्सक पूरी प्रक्रिया को दर्द-रहित और सम्मानजनक बनाने पर काम कर रहे हैं। फिलहाल, स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। पैलिएटिव केयर के तहत दर्द प्रबंधन और मानसिक शांति पर विशेष ध्यान रखा जा रहा है। हरीश राणा के माता पिता पहले ही उनके कार्यशील अंगों के दान का संकल्प जता चुके हैं। हालांकि, यह मेडिकल जांच पर निर्भर करेगा। डॉक्टर और नर्सिंग कर्मचारी हरीश राणा की देखभाल कर रहे डॉक्टरों के अनुसार, जीवन बचाने के लिए कोई एक्टिव इलाज या वेंटिलेटर सपोर्ट उन्हें नहीं दिया जाएगा। पैलिएटिव केयर में मरीज को दर्द या किसी तरह की पीड़ा होने पर राहत देना होता है। ऐसे में हरीश के कई दिनों तक एम्स में एडमिट रहने की उम्मीद है। एम्स प्रबंधन ने विशेषज्ञ डॉक्टर के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई है। पांच सदस्यों की विशेष टीम में डॉक्टर और नर्सिंग कर्मचारी शामिल हैं जो दिन-रात हरीश की देखभाल कर रहे हैं।
पैलिएटिव केयर वार्ड में छह बेड की सुविधा
डॉक्टर के अनुसार, पैलिएटिव केयर वार्ड में छह बेड की सुविधा है। हरीश के स्वास्थ्य का मूल्यांकन लगातार जारी है। समय-समय पर डॉक्टर आगे की प्रक्रिया निर्धारित करेंगे। डॉक्टरों का कहना है कि इच्छामृत्यु की प्रक्रिया में समय का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है। इस दौरान मेडिकल टीम लगातार मरीज की स्थिति की निगरानी करेगी और समय-समय पर रिपोर्ट तैयार कर अदालत को सौंपेगी। अंतिम निर्णय इन्हीं रिपोर्ट्स के आधार पर लिया जाएगा।
'पैलिएटिव केयर में मौत को तेज नहीं किया जाता'
अस्पताल के पूर्व पैलिएटिव विशेषज्ञ डॉ. सुशमा भटनागर के अनुसार, पैलिएटिव केयर में मौत को तेज नहीं किया जाता, बल्कि दर्द-तकलीफ कम कर प्राकृतिक मौत की अनुमति दी जाती है। फोकस मरीज की आराम और गरिमा पर है। भारत के पहले निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लागू करने के लिए डॉ. सीमा मिश्रा की अध्यक्षता में एक विशेष मेडिकल टीम का गठन किया गया है। डॉ. सीमा मिश्रा एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं। इस टीम में न्यूरो सर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन और मनोरोग विभागों के डॉक्टर शामिल हैं।
15 दिन से एक महीना तक लग सकता है
एम्स के पूर्व निदेशक और सीताराम भारतीय इंस्टीट्यूट के कंसलटेंट डॉ. एमसी मिश्रा ने बताया कि ऐसे मामलों में हर कदम बेहद सावधानी से उठाया जाता है। डॉक्टर मरीज की स्थिति का आकलन कर कोर्ट को रिपोर्ट देते हैं और उसी के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होती है। हरीश राणा के मामले में यह कहना मुश्किल है कि उनकी सांसें कब तक चलेंगी। अगर निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो न्यूट्रिशन बंद करने के बाद भी 15 दिन, एक महीना या उससे ज्यादा समय लग सकता है।
हरीश के अंगदान पर भी टीम कर रही जांच
सूत्रों के अनुसार, हरीश के अंगों को दान करने के परिवार के संकल्प के बाद, एम्स की एक मेडिकल टीम अपने सहयोगियों की मदद से उनके शरीर की पूरी जांच कर रही है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कौन से अंग अभी काम कर रहे हैं और दान के लिए सही हैं। इसके बाद पूरी जानकारी और सहमति के साथ अंग निकालने की जरूरी प्रक्रिया शुरू की जाएगी। हरीश के माता-पिता ने बड़ा दिल दिखाते हुए अंगदान का फैसला किया है। एम्स के नियमों के अनुसार, हरीश की किडनी, दिल, पैंक्रियास और आंतों जैसे अंगों को दान के लिए विचाराधीन रखा गया है, बशर्ते वे काम कर रहे हों। उनकी कॉर्निया और हार्ट वाल्व की भी जांच की जा रही है। शुरुआती जांच के बाद, डॉक्टर तय करेंगे कि कौन से अंग ट्रांसप्लांट के लिए सुरक्षित रूप से निकाले जा सकते हैं।
यह है मामला
जुलाई 2010 में हरीश ने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। वर्ष 2013 में वह अंतिम वर्ष के छात्र थे। इसी दौरान अगस्त 2013 में रक्षाबंधन वाले दिन बहन से मोबाइल फोन पर बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर रूप से घायल हरीश को तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। बाद में दिसंबर 2013 में उसे दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित है। इस स्थिति में उसके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो गए और वह जीवन भर बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए। हरीश के असहनीय दर्द और शारीरिक अक्षमता के कारण माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की, जिसे 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी।
कब क्या हुआ
- जुलाई 2010 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया।
- 21 अगस्त 2013 की रात बहन से बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिरकर घायल।
- अगस्त 2013 में पीजीआई चंडीगढ़ में इलाज के लिए भर्ती।
- दिसंबर 2013 में दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में कराया गया भर्ती।
- वर्ष 2013 डॉक्टरों ने बताया हरीश क्वाडिप्लेजिया से ग्रसित।
- वर्ष 2020 में दिल्ली से राजनगर एक्सटेंशन के राज एंपायर में परिवार हुआ शिफ्ट।
- वर्ष 2021 में पिता अशोक राणा को दिल्ली में स्थित तीन मंजिला मकान बेचना पड़ा।
- 8 जुलाई 2025 हाईकोर्ट दिल्ली से इच्छा मृत्यु की अर्जी खारिज।
- 11 मार्च 2026 को इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी।
- 14 मार्च को हरीश राणा को गाजियाबाद से दिल्ली स्थित एम्स ले जाया गया
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